रविवार, 7 अप्रैल 2013

होरी कबिता

होरी


तरका -तरका गप्प कहै छी , हिम्मत बहुत जूटौने छी ,

बड़-बड़ माल  पचिसी देख क अप्पन नैन पिजौने छि .

कैमप्स में छि फेल सब्जेक्ट्ली, नम्बर बहुत नपौने छि ,
२ ४ - २ ६ , २ ८ -३ ० , ३ २ धरी पहुचौने छि ,
हे , कहियो-कहियो भीड़-भाड़ में, मौध में आंगुर डूबौने छि .

गाम प एकही टा भौजी, सदिखन सटर खासौने छथि  ,
कखनो-कखनो हुलकी  मारैथ, मुस्की गाल दबौने छथि  .

सासु हमर छथी बहुत दरेग्गर , नितहु घी पियौने  छथि ,
चारी टैम जाई हम नदी , चोटकल गाल सुखौने  छी .

गुढ़ बात सासुर के सुनियौ, सरहोज बैश नुकौने छथि ,
सार क छनि  उमेर कनी कच्चा, चुसना ठोढ़ दबौने छथि .

सारि के छनी पातर साड़ी, ढोढी सँ बित्ता खासौने छथि,
चाबस कही हुनक बुधीयारी  लोक क हिया जुडौने छथि .

चार हमर टिकल हुनके प, कानियाँ क चरण दबौने छि ,
चारी कोस दूर गाम हमर अछि, तै थुथुना अलगौने छि .

----------------------------------- ब्रज मोहन झा